Ied Blast: Terrorists And Naxalites Are Making Ied Detonators Indigenously – Ied Blast: आतंकियों और नक्सलियों के हाथ लगी इस विस्फोटक की तकनीक, पहले ट्रेनिंग के लिए जाते थे अफगानिस्तान

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IED Blast

IED Blast
– फोटो : Amar Ujala/Himanshu

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देश के नक्सल प्रभावित एवं आतंक ग्रस्त इलाकों में इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस यानी ‘आईईडी’ ब्लास्ट एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। मौजूदा दौर में जब राष्ट्रविरोधी ताकतों पर शिकंजा कसने लगा है, तो आतंकियों व नक्सलियों के सामने नई भर्ती का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में ये तत्व सुरक्षा बलों के सामने आने से बचने लगे हैं। आतंकी और नक्सली, अब छिपकर सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचाने की रणनीति बना रहे हैं। इसके लिए वे आईईडी ब्लास्ट की मदद लेते हैं। पहले इस तरह के ब्लास्ट को तैयार करने एवं उसे लगाने की ट्रेनिंग लेने के लिए आतंकियों को अफगानिस्तान जाना पड़ता था। कुछ आतंकी समूह अपने गुर्गों को पाकिस्तान भेजते थे। इस बीच नक्सलियों ने भी आईईडी ब्लास्ट की तकनीक हासिल कर ली। खास बात ये है कि नक्सली अब आईईडी ब्लास्ट तैयार करने में आतंकियों से काफी आगे निकल चुके हैं। यहां तक कि नक्सल प्रभावित इलाकों में महिलाओं और बच्चों को भी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

बरामद हो चुकी हैं हजारों आईईडी

नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ एवं दूसरे सुरक्षा बलों ने हजारों आईईडी बरामद की हैं। झारखंड का बूढ़ा पहाड़ इलाका अब सुरक्षा बलों के कब्जे में है। ऑपरेशन ऑक्टोपस ने यहां नक्सलियों की कमर तोड़ दी। इससे पहले लातेहार-लोहरदगा सीमा पर बुलबुल जंगल में ऑपरेशन डबल-बुल को अंजाम दिया गया। 18 दिन चले ऑपरेशन में 14 एनकाउंटर हुए थे। मुठभेड़ वाले इलाके से 16 आईईडी बरामद हुईं। 196 डेटोनेटर एवं 28 घातक हथियारों से लैस 14 हार्डकोर नक्सली धरे गए। ऑपरेशन आक्टोपस में चाइनीज ग्रेनेड सहित सौ से अधिक आईईडी बरामद की गईं। गया और औरंगाबाद में स्थित घने जंगलों में कोबरा दस्ते ने नक्सलियों के कब्जे से 500 डेटोनेटर, एक हजार आईईडी, प्रेशर बम, केन आईईडी बरामद की थी। नक्सल प्रभावित दूसरे इलाकों में भी आईईडी बरामद होती रही हैं।

एनआईए की चार्जशीट में हुआ है खुलासा

राजस्थान के निम्बाहेड़ा में बरामद विस्फोटक केस में एनआईए द्वारा 22 सितंबर को पेश की गई चार्जशीट में दावा किया गया है कि आरोपी खुद ही आईईडी तैयार कर रहे थे। जांच में सामने आया कि सूफा आतंकी गैंग के मुख्य साजिशकर्ता इमरान खान और उसके सहयोगी आईएसआईएस से प्रेरित थे। इमरान खान अपने फार्म हाउस पर आईईडी तैयार करने की ट्रेनिंग देता था। इसके लिए स्थानीय दुकानों से सामग्री खरीदी जाती थी। इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें आरोपी आसपास के क्षेत्र से ही केमिकल खरीदकर उसकी मदद से विस्फोटक सामग्री तैयार करते थे। अब नक्सली इलाकों में सुरक्षा बलों के खिलाफ आईईडी का इस्तेमाल आम बात हो गई है। इसे दो तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। एक, वाहन उड़ाने के मकसद से और दूसरा, जंगल में आगे बढ़ रहे सुरक्षा बलों को हमले की चपेट में लाने के लिए रास्ते पर आईईडी दबा दी जाती है। आईईडी बनाने और उसे लगाने की ट्रेनिंग का तरीका वैसा ही है, जैसा अफगानिस्तान के आतंकियों के समूहों में देखने को मिलता है। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय कई आतंकी संगठनों के सदस्य भी अफगानिस्तान से आईईडी तैयार करने का प्रशिक्षण लेकर आए थे।

एंटी पर्सनल आईईडी और लैंड माइन का इस्तेमाल

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में एंटी पर्सनल आईईडी और लैंड माइन आईईडी, इन दोनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। लैंड माइन आईईडी का इस्तेमाल वाहन आदि को उड़ाने के लिए किया जाता है। यह रिलीज मैकेनिज्म पर काम करती है। फॉक्स होल सुरंग में एल आकार में आईईडी लगाई जाती है। मोबाइल एंबुश लगाने में नक्सली एक्पर्ट हो गए हैं। मल्टीपल आईईडी को बतौर डेजी चेन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। आईईडी को रिमोट कंट्रोल, इंफ्रारेड मैग्नेटिक ट्रिगर्स, प्रेशर सेंसिटिव बार व ट्रिप वायर की मदद से संचालित किया जाता है। एक बैलिस्टिक एक्सपर्ट कहते हैं कि आतंकी और नक्सली, आईईडी टिफिन बम का इस्तेमाल करने लगे हैं। कॉम्बिनेशन आरडीएक्स की थ्योरी भी राष्ट्र विरोधी ताकतों के हाथ लगी है। हालांकि आईईडी के जरिए विस्फोट करना आसान काम नहीं है। इसमें टाइमिंग का फैक्टर बहुत अहम रहता है। विस्फोट तैयार करने वाला व्यक्ति एक्सपर्ट है तो ही वह सुरक्षित तरीके से ब्लास्ट कर सकता है।  

आरडीएक्स व पीईटीएन का इस्तेमाल

नक्सली या आतंकियों द्वारा उच्च विस्फोटक तकनीक यानी आरडीएक्स व पीईटीएन का इस्तेमाल करने की तकनीक भी हासिल की गई है। चूंकि यह विस्फोटक सामग्री आसानी से नहीं मिलती है, इसलिए इनका इस्तेमाल उतना नहीं हो पा रहा है। कम क्षमता वाले विस्फोटक जैसे पोटेशियम, चारकोल, आर्गेनिक सल्फाइड, नाइट्रेट व ब्लैक पाउडर आदि से आईईडी और टिफिन बम तैयार कर लिए जाते हैं। पीडब्ल्यूडी एवं माइनिंग जैसे विभागों में जिलेटिन स्टिक का इस्तेमाल होता रहा है। इसकी मदद से आईईडी, टिफिन व प्रेशर बम तैयार होते हैं। इन्हें रिमोट या टाइमर से ब्लास्ट किया जाता है। मौजूदा दौर में ऐसे ब्लास्ट तैयार करने के लिए आतंकियों के पास कंटेनर, केमिकल, डेटोनेटर, इनिशिएटर और वायर ये सब कुछ रहता है। डेटोनेटर को पावर देने के लिए ड्राई बैटरी सेल का उपयोग करते हैं। आजकल तो स्पेशल डेटोनेटर भी आ रहे हैं। स्पेशल डेटोनेटर में घड़ी का सेल काम करता है। ज्यादा वोल्टेज चाहिए, तो तीन-चार सेल जोड़ दिए जाते हैं। राष्ट्र विरोधी ताकतों के पास ये सब तकनीक आना, सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती है। नक्सल व आतंक ग्रस्त इलाकों में आईईडी की चपेट में आने से अनेक अफसर व जवान शहीद हो चुके हैं।

विस्तार

देश के नक्सल प्रभावित एवं आतंक ग्रस्त इलाकों में इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस यानी ‘आईईडी’ ब्लास्ट एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। मौजूदा दौर में जब राष्ट्रविरोधी ताकतों पर शिकंजा कसने लगा है, तो आतंकियों व नक्सलियों के सामने नई भर्ती का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में ये तत्व सुरक्षा बलों के सामने आने से बचने लगे हैं। आतंकी और नक्सली, अब छिपकर सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचाने की रणनीति बना रहे हैं। इसके लिए वे आईईडी ब्लास्ट की मदद लेते हैं। पहले इस तरह के ब्लास्ट को तैयार करने एवं उसे लगाने की ट्रेनिंग लेने के लिए आतंकियों को अफगानिस्तान जाना पड़ता था। कुछ आतंकी समूह अपने गुर्गों को पाकिस्तान भेजते थे। इस बीच नक्सलियों ने भी आईईडी ब्लास्ट की तकनीक हासिल कर ली। खास बात ये है कि नक्सली अब आईईडी ब्लास्ट तैयार करने में आतंकियों से काफी आगे निकल चुके हैं। यहां तक कि नक्सल प्रभावित इलाकों में महिलाओं और बच्चों को भी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

बरामद हो चुकी हैं हजारों आईईडी

नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ एवं दूसरे सुरक्षा बलों ने हजारों आईईडी बरामद की हैं। झारखंड का बूढ़ा पहाड़ इलाका अब सुरक्षा बलों के कब्जे में है। ऑपरेशन ऑक्टोपस ने यहां नक्सलियों की कमर तोड़ दी। इससे पहले लातेहार-लोहरदगा सीमा पर बुलबुल जंगल में ऑपरेशन डबल-बुल को अंजाम दिया गया। 18 दिन चले ऑपरेशन में 14 एनकाउंटर हुए थे। मुठभेड़ वाले इलाके से 16 आईईडी बरामद हुईं। 196 डेटोनेटर एवं 28 घातक हथियारों से लैस 14 हार्डकोर नक्सली धरे गए। ऑपरेशन आक्टोपस में चाइनीज ग्रेनेड सहित सौ से अधिक आईईडी बरामद की गईं। गया और औरंगाबाद में स्थित घने जंगलों में कोबरा दस्ते ने नक्सलियों के कब्जे से 500 डेटोनेटर, एक हजार आईईडी, प्रेशर बम, केन आईईडी बरामद की थी। नक्सल प्रभावित दूसरे इलाकों में भी आईईडी बरामद होती रही हैं।

एनआईए की चार्जशीट में हुआ है खुलासा

राजस्थान के निम्बाहेड़ा में बरामद विस्फोटक केस में एनआईए द्वारा 22 सितंबर को पेश की गई चार्जशीट में दावा किया गया है कि आरोपी खुद ही आईईडी तैयार कर रहे थे। जांच में सामने आया कि सूफा आतंकी गैंग के मुख्य साजिशकर्ता इमरान खान और उसके सहयोगी आईएसआईएस से प्रेरित थे। इमरान खान अपने फार्म हाउस पर आईईडी तैयार करने की ट्रेनिंग देता था। इसके लिए स्थानीय दुकानों से सामग्री खरीदी जाती थी। इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें आरोपी आसपास के क्षेत्र से ही केमिकल खरीदकर उसकी मदद से विस्फोटक सामग्री तैयार करते थे। अब नक्सली इलाकों में सुरक्षा बलों के खिलाफ आईईडी का इस्तेमाल आम बात हो गई है। इसे दो तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। एक, वाहन उड़ाने के मकसद से और दूसरा, जंगल में आगे बढ़ रहे सुरक्षा बलों को हमले की चपेट में लाने के लिए रास्ते पर आईईडी दबा दी जाती है। आईईडी बनाने और उसे लगाने की ट्रेनिंग का तरीका वैसा ही है, जैसा अफगानिस्तान के आतंकियों के समूहों में देखने को मिलता है। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय कई आतंकी संगठनों के सदस्य भी अफगानिस्तान से आईईडी तैयार करने का प्रशिक्षण लेकर आए थे।

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